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भगदत्तपुर से प्रागज्योतिषपुर : एक पौराणिक यात्रा का आधुनिक पड़ाव

भागलपुर से गुवाहाटी की यह यात्रा मेरे लिए केवल एक भौगोलिक दूरी तय करना भर नहीं थी, यह इतिहास और पुराकथाओं के गलियारों से गुजरने का अनुभव थी। जब मैं रेलगाड़ी की खिड़की से बाहर झांक रहा था, तो मन किसी और ही युग में चला गया — उस समय में जब गंगा और ब्रह्मपुत्र युद्ध की रणनीतियों के मार्ग हुआ करते थे, जब राजाओं की सेनाएं जलमार्ग से कूच करती थीं और नगरों को नाम किसी ठहराव, किसी घटना से मिल जाता था।
भागलपुर, जिसे कभी अंग देश की राजधानी चंपा कहा जाता था, वही स्थान है जिसे कर्ण ने महाभारत युद्ध के दौरान राजा भगदत्त ( दुर्योधन के ससुर थे) के स्वागत और शिविर के लिए चुना था। कहा जाता है, कर्ण ने इस स्थान को “भगदत्तपुर” नाम दिया — शायद मित्रता और समर्पण का यह भी एक रूप था। कई किंवदंतियों और जनश्रुतियों के अनुसार, यही भगदत्तपुर आगे चलकर भागलपुर के रूप में जाना गया। इस धारणा को बल मिलता है जब हम गंगा किनारे बसे इस ऐतिहासिक नगर को महाभारत की घटनाओं से जोड़कर देखते हैं।
राजा भगदत्त, कामरूप (आज का असम) के शक्तिशाली राजा थे। उनकी राजधानी प्रागज्योतिषपुर, यानी आज का गुवाहाटी, ब्रह्मपुत्र के किनारे बसा है। गंगा और ब्रह्मपुत्र — दोनों ही नदियाँ इस कथा में मौन लेकिन सशक्त पात्र हैं। एक के किनारे से प्रस्थान, दूसरी के किनारे आगमन। कल्पना कीजिए, महाभारत के समय राजा भगदत्त अपनी विशाल सेना और गजदल के साथ गंगा से ब्रह्मपुत्र के संगम तक जलमार्ग से यात्रा कर रहे हैं, और आज मैं उन्हीं स्थलों को जोड़ता रेलमार्ग से।
इसी भूमि से जुड़ी एक और लोकगाथा मन में कौंध जाती है — बिहुला-लखंदर की प्रेमगाथा, जो चंपा (भागलपुर) से शुरू होती है और जिसकी कथा का एक सिरा ग्वालपाड़ा (असम) से भी जुड़ता है। क्या यह केवल संयोग है कि लोककथाएं भी गंगा से ब्रह्मपुत्र तक की पुल बनाती हैं?
जब ट्रेन साहिबगंज, मालदह को पार कर कूचबिहार और न्यू बोंगाईगांव की ओर बढ़ती है, तो लगता है मैं केवल प्रदेश नहीं, युग पार कर रहा हूं। आधुनिक स्टेशनों के संकेत मेरे मोबाइल में चमकते हैं, लेकिन मन अभी भी उस काल में अटका है जब नदियों पर नौकाएं युद्ध और वफादारी का संदेश लेकर चलती थीं।
भागलपुर से गुवाहाटी लौटते हुए महसूस हुआ कि इतिहास कोई बीती बात नहीं होती — वह हमारे रास्तों, नामों और स्मृतियों में अब भी सांस लेता है। कर्ण का मित्र भाव, भगदत्त की वीरता, चंपा की प्रेमगाथा, प्रागज्योतिषपुर की गरिमा — सब इस यात्रा में मेरे सहयात्री थे।
मैं रेलगाड़ी में अकेला नहीं था। मेरे साथ इतिहास था, पौराणिक कथाएं थीं, और वह सब कुछ था जो गंगा और ब्रह्मपुत्र के जल में अनादिकाल से बहता आ रहा है।

 

सरायघाट से फरक्का तक: ब्रह्मपुत्र से गंगा की ओर

(एक रेल यात्रा और दो नदियों के मिलन की कथा)
छठ पर्व में जब घर नहीं जा पाता था, मां से कहता था, मां तुम गंगा किनारे सूप हाथ में उठाना और मैं ब्रह्मपुत्र के किनारे से अर्घ्य दे दूंगा, क्योंकि ब्रह्मपुत्र आगे जाकर गंगा में मिल जाती है। तुम्हारा सूप गंगा को स्पर्श करेगा तो मेरे अर्पित जल अंश ब्रह्मपुत्र के साथ जाकर छठ के उस सूप को स्पर्श कर लेगा। ब्रह्मपुत्र को देख उन दिनों को याद कर रहा था।
शाम के लगभग पांच बजे कामाख्या स्टेशन से ब्रह्मपुत्र मेल धीरे-धीरे सरकती है। अभी-अभी इंजन की घरघराहट के साथ ट्रेन ने गति पकड़ी ही थी कि सामने आ गया ब्रह्मपुत्र नदी पर बना ऐतिहासिक सरायघाट पुल। मैं खिड़की से बाहर झांकता हूं — नीचे विशाल, शांत, गंभीर ब्रह्मपुत्र अपने पूरे विस्तार के साथ बह रही है। जैसे समय की तरह, निरंतर, अविराम।
यह दृश्य हमेशा मन को छू जाता है। ब्रह्मपुत्र — पूर्वोत्तर भारत की जीवनरेखा — यहां से पश्चिम की ओर बहती है, जैसे किसी गहरी सोच में डूबा कोई साधु, जो तमाम घाटियों और जंगलों से गुजरते हुए अपनी साधना पूरी करने चला हो।
रेल यात्रा का यह हिस्सा मेरे लिए हमेशा विशेष रहा है। सरायघाट से आगे बढ़ते हुए जैसे हर स्टेशन, हर पुल, हर आवाज़ कोई पुरानी स्मृति जगा देती है। रात कब बीत जाती है, पता ही नहीं चलता। और फिर अगली सुबह, लगभग 5:30 बजे, आंख खुलती है तो महसूस होता है कि ट्रेन अब फरक्का पुल पार कर रही है — इस बार नीचे बह रही है गंगा।
एक शाम ब्रह्मपुत्र और एक सुबह गंगा। एक ही यात्रा में दो विशाल नदियों से संवाद। एक गहरा आध्यात्मिक अनुभव।
गंगा और ब्रह्मपुत्र — दोनों हिमालय की गोद से निकलती हैं, लेकिन भिन्न दिशाओं से।
गंगा उत्तराखंड की गंगोत्री से निकलकर उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड होते हुए पश्चिम बंगाल आती है।
ब्रह्मपुत्र तिब्बत की मानसरोवर झील से निकलती है, अरुणाचल प्रदेश की पहाड़ियों में प्रवेश करती है, असम को चीरती हुई पश्चिम बंगाल और फिर बांग्लादेश में प्रवेश करती है।
अचरज की बात है कि दोनों का उद्गम इतना दूर, रास्ते इतने अलग — फिर भी दोनों की मंज़िल एक ही: बांग्लादेश में एक-दूसरे को गले लगाना।
गंगा वहां पद्मा बन जाती है, और ब्रह्मपुत्र जमुना। नाम बदल जाते हैं, पर जल वही रहता है — अपनी पहचान त्याग कर एक नई पहचान में विलीन होने वाला। और अंततः दोनों सागर में समा जाती हैं — जैसे आत्मा परमात्मा में।
सोचता हूं, ये नदियां कितनी विशाल हैं, कितनी उदार। अपने रास्ते में सभ्यताओं को पालती हैं, खेतों को सींचती हैं, संस्कृतियों को जोड़ती हैं। लेकिन इनके भीतर कोई अहंकार नहीं। कोई दावा नहीं, कोई प्रतिद्वंद्विता नहीं। बस समर्पण।
सरायघाट से फरक्का के बीच ट्रेन की यह रात मेरी स्मृतियों की एक नदी बन जाती है। जिस तरह ब्रह्मपुत्र और गंगा एक लंबा सफर तय करके मिलती हैं, ठीक वैसे ही यह यात्रा भी है — बचपन की स्मृतियों से वर्तमान के अनुभवों तक, रेल की पटरी पर बिछी आत्मीयता की एक रेखा।
स्टेशन आते हैं, गुजर जाते हैं। खोमचे वाले चाय, समोसे, केले, मूंगफली लेकर आते हैं — जैसे जीवन के रास्ते में अवसर आते हैं और हमसे कह जाते हैं: जो मन करे, चुन लो।
ब्रह्मपुत्र मेल की इस यात्रा में, मैं सिर्फ भागलपुर नहीं जा रहा — मैं अपने भीतर भी उतर रहा हूं। दो नदियों के मिलन के बहाने, मैं अपने अंदर की दो धाराओं को जोड़ने की कोशिश कर रहा हूं — स्मृति और अनुभव, अतीत और वर्तमान।
सरायघाट से फरक्का तक — यह केवल 12 घंटे की रेल यात्रा नहीं है। यह आत्मा की एक नदी है, जो जीवन के महासागर से मिलने निकली है।

 

ब्रह्मपुत्र मेल की गोद में — एक भावुक यात्रा

कामाख्या स्टेशन की परिचित गंध और आवाज़ों के बीच खड़ा हूं — अरसे बाद ब्रह्मपुत्र मेल की सवारी करने के लिए। कभी यह तिनसुकिया मेल हुआ करती थी, वही रेलगाड़ी जिसने गुवाहाटी और भागलपुर के बीच मेरी ज़िंदगी के कितने ही सफ़र तय किए। उस दौर में यह एकमात्र कड़ी थी जो दो शहरों को नहीं, दो जीवनों को जोड़ती थी — मेरा अतीत और मेरा वर्तमान।
हर स्टेशन का नाम आज भी ज़ेहन में ज्यों का त्यों अंकित है — कोकराझार, न्यू जलपाईगुड़ी, मालदा, साहेबगंज, कहलगांव…। इस रेलगाड़ी से अपनापन हो गया था, जैसे कोई परिवार का हिस्सा हो। एक बार इस ट्रेन को उग्रवादियों ने निशाना बनाया था, कई मासूम यात्री मारे गए। उस दिन मेरा मन इतना विचलित हुआ कि आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। लगा जैसे किसी अपने को खो दिया हो।
याद आता है, जब बच्चों के साथ सफर करता था, तो एच. व्हीलर से पराग, चंपक, कॉमिक्स और अपने लिए ‘सारिका’ खरीदना एक रस्म बन गई थी। वही ब्रह्मपुत्र मेल, जिसे बेटा आज भी याद करता है — हमारे फैमिली वॉट्सएप ग्रुप का नाम भी ‘ब्रह्मपुत्र मेल’ है।
तब सिंगल लाइन और डीज़ल इंजन के चलते यह ट्रेन आते वक्त थक-सी जाती थी। अब विद्युतीकरण और दोहरी लाइन के कारण तेज हो गई है। पर मेरी यादों की रफ्तार अभी भी उसी पुराने पटरियों पर दौड़ रही है।
आज फिर इस ट्रेन में बैठा हूं, भागलपुर के रास्ते में। मन रोमांचित है, आंखों में पुरानी छवियां तैर रही हैं। खोमचे वाले आएंगे, कुछ नया देंगे, कुछ पुराना लौटा देंगे। ब्रह्मपुत्र मेल फिर एक बार मुझे खुद से मिलाने निकली है — रेल की पटरियों पर बिछी मेरी स्मृतियों की यात्रा पर।
एक अजीब अनुभूति हो रही है और हर्ष भी। लंबी ट्रेन यात्रा मेरी रुचि रही है। एक नया अनुभव फिर से होने वाला है।

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