Skip to content Skip to sidebar Skip to footer

ब्रह्मपुत्र के किनारे ज़िंदगी की नई पहचान

मेरे 63वें वसंत की दहलीज़ पर एक आत्मावलोकन

आज जब ज़िंदगी के 63वें पड़ाव पर क़दम रख रहा हूँ, तो भीतर एक आत्मीय पुलक है। बीते वर्षों की स्मृतियाँ किसी चित्रपटकथा की तरह आँखों के सामने घूम रही हैं। जीवन का यह सफ़र कोई सीधा-सपाट रास्ता नहीं था, बल्कि विविध रंगों, संस्कृतियों और अनुभवों से रचा-बसा एक गहन प्रवास रहा। इनमें सबसे सुंदर, सबसे समृद्ध और सबसे गहरे रंगों से भरा वह हिस्सा है, जो मैंने असम की पावन भूमि पर बिताया।

गंगा के तट पर जन्मा था, पर ब्रह्मपुत्र के किनारे जीवन की सार्थकता पाई। बीते 36 वर्ष—जीवन के आधे से भी अधिक—असम में व्यतीत हुए। यह केवल स्थानांतरण नहीं था, यह तो आत्मा की यात्रा थी, जो एक नई मिट्टी, एक नई भाषा और एक नई संस्कृति से तादात्म्य स्थापित करने निकली थी।

श्रीमंत शंकरदेव की पवित्र भूमि असम में कदम रखते ही मुझे लगा, जैसे यह धरती ऊर्जा से भरी है। यहां की हवा में बोहाग बिहू का उमंग है, लोकगीतों में डॉ. भूपेन हजारिका की आत्मा है, और जन-जन के स्वभाव में एक सहज आत्मीयता है। यहाँ रहकर मैंने जीवन की सादगी को नज़दीक से देखा—सीधे-सादे लोग, पर भाषा और संस

Leave a Comment