रतन थियम एक कलाकार नहीं, एक सांस्कृतिक आंदोलन थे। वे मंच पर सिर्फ नाटक नहीं रचते थे, बल्कि सभ्यता, समाज और मानवीय चेतना की पुनर्रचना करते थे। भारतीय रंगमंच ने एक सितारा खो दिया।
मणिपुर के प्र‘यात नाटककार, निर्देशक और रंगदर्शक रतन थियम अब हमारे बीच नहीं रहे। उनका जाना केवल मणिपुर की सांस्कृतिक विरासत की क्षति नहीं है, बल्कि पूरे भारतीय रंगमंच को एक गहरी खाली जगह सौंप जाना है। रतन थियम एक कलाकार नहीं, एक सांस्कृतिक आंदोलन थे। वे मंच पर सिर्फ नाटक नहीं रचते थे, बल्कि सभ्यता, समाज और मानवीय चेतना की पुनर्रचना करते थे। उनके नाटकों में एक ओर मणिपुर की समृद्ध परंपरा की गूंज सुनाई देती थी तो दूसरी ओर विश्व रंगमंच की आधुनिक प्रवृत्तियां भी झलकती थीं। रतन थियम का जन्म 1948 में मणिपुर के इंफाल में हुआ। वे उन बिरले रंगकर्मियों में थे जिन्होंने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से विधिवत शिक्षा प्राप्त की और फिर अपनी जमीन की ओर लौटकर एक सांस्कृतिक क‘ांति का सूत्रपात किया। उन्होंने 1976 में ’चंद्रमुखी ड्रामा यूनियन’ की स्थापना की, जो आगे चलकर ‘श्रीमंत शंकरदेव रिपर्टरी थिएटर’ में विकसित हुआ। मणिपुरी नाट्य शैलियों, लोकगाथाओं, शास्त्रीय तत्वों और आधुनिक रंग भाषाओं का ऐसा समन्वय किसी और रंगकर्मी के यहां शायद ही दिखाई देता हो।
उनकी सबसे उल्लेखनीय उपलब्धियों में से एक है थांग-ता (मणिपुर की पारंपरिक मार्शल आर्ट) और नाट संकीर्तन जैसी कलाओं को रंगमंच की भाषा में पिरोना। उन्होंने मंच को केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि एक पूर्ण अनुभव बना दिया, जहां संगीत, गति, आंतरिक ऊर्जा, प्रकाश और मौन, सब एक साथ बोलते हैं। उनके नाटकों में ‘उत्तरप्रियदर्शी’, ‘चक‘व्यूह’, ‘अंध युग’, ‘उरुभांगम’, ‘वेनिशन व्यापारी’ जैसे शास्त्रीय और पाश्चात्य कृतियों के मणिपुरी रूपांतरण शामिल हैं, जो अपने सौंदर्य और वैचारिक गहराई के लिए विश्व भर में सराहे गए। उनका ‘उत्तरप्रियदर्शी’ न केवल अशोक के अंतर्द्वंद्व की कथा कहता है, बल्कि समकालीन सत्ता और युद्ध की विडंबनाओं पर भी गहरा सवाल खड़ा करता है। ‘अंध युग’ में उन्होंने महाभारत के विनाश के बाद की नैतिक गुत्थियों को मंच पर उतारते हुए वर्तमान मानवता के सवालों को जीवंत किया। रतन थियम का रंगमंच सिर्फ एक कलात्मक उद्यम नहीं था, बल्कि सामाजिक हस्तक्षेप भी था। मणिपुर जैसे अशांत और संघर्षरत राज्य में उन्होंने रंगकर्म को संवाद और शांति की भाषा बनाया। सांस्कृतिक हिंसा के विरुद्ध उनका मंच एक शस्त्र की तरह था, जिसमें सौंदर्य और सत्य की धार थी। वे मानते थे कि रंगमंच एक मंदिर है, अभिनेता एक पुजारी और नाटक एक अनुष्ठान। रतन थियम की अंतरराष्ट्रीय पहचान है। उन्होंने अपने नाटकों के जरिए भारत का प्रतिनिधित्व जापान, फ‘ांस, जर्मनी, अमेरिका सहित दर्जनों देशों में किया। वे इंटरनेशनल थिएटर इंस्टीट्यूट के सदस्य थे और उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1987), पद्मश्री (1989), कालिदास सम्मान (1997), और संगीत नाटक अकादमी फैलोशिप (2012) जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया।
रतन थियम की मृत्यु के साथ मणिपुर ने एक सांस्कृतिक गुरु खोया है और भारत ने एक ऐसा द्रष्टा रंगकर्मी, जिसकी दृष्टि पारंपरिक और आधुनिक के बीच पुल बनाती थी। उनकी अनुपस्थिति केवल एक व्यक्ति की नहीं, एक विचार, एक प्रयोगशील चेतना और एक कलात्मक संकल्प की अनुपस्थिति है। आज जब भारतीय रंगमंच पहचान के संकट, बाजारवादी प्रभावों और सतही प्रस्तुतियों के दौर से गुजर रहा है, तब रतन थियम जैसे पुरोधाओं की याद और भी प्रासंगिक हो जाती है। उनका जीवन और कार्य हमें यह सिखाते हैं कि सच्चा रंगकर्म केवल मंच सजाने का काम नहीं, बल्कि आत्मा को सजग करने की प्रकि‘या है। वे भले ही अब न हों, लेकिन उनका नाट्य लोक आज भी जीवित है, प्रत्येक उस दृश्य, उस ध्वनि, उस मौन में जो आत्मा को झकझोरती है। वे मंच से उतरे नहीं हैं, बस एक नए दृश्य में प्रवेश कर गए हैं – जहां से वे आने वाले कलाकारों को प्रेरणा देते रहेंगे। रतन थियम अमर रहें।
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